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Tuesday, 4 December 2018

जिद अपनी अपनी

मेरा जन्म हुआ
सिर्फ उजालों के खातिर
मैं दिया हूं,
मैं बस देता ही देता हूँ
तब तक,
जब तक खाली न हो जाऊँ
हवाएँ तो
व्यर्थ दुश्मनी में लगी है
ये शायद
बुझा कर भी बन्द न होगी
जिद है बस
उसकी अपनी, मेरी अपनी

Monday, 26 November 2018

स्वप्न की निशिगन्ध

हमारे स्वप्न भी
उच्छृंखल हो गए हैं
कभी ये नींद उड़ा देते हैं,
कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखता हूँ माटी का गेरूआ रंग
बौराए आम की घनी छाँव मे
ठहर जाता है वक्त किसी
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
उन्मत्त स्वाँसों की
महक उठती है निशिगंध

दो दो नयन

स्वप्न भी उच्छृंखल हो गए हैं
कभी नींद उड़ा देते हैं
तो कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखते हैं माटी का गेरूआ रंग
ठहर जाता है वक्त किसी
बौराए आम की घनी छाँव में
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
बस नयन ही कहते रहे
सुनते ही रहे नयन
हमारे अयन

स्फुलिंग

जब से अपनी बाजू का
सिरहाना हटाया है तुमने

सिर के नीचे अब
सिर्फ सपने ही ऊधम करते हैं

तू करुण रसधार

तू करुण रसधार है,
   हूँ मैं विरल निश्वास।
    नील नभ की पाँख है तू
     मैं तृषित अहसास।।

मानिनी मन मोद की तू ,
   मैं  विखण्डित  तार।
     ज्योत्सना है तू शरद की,
       मैं शिशिर का ज्वार।।

Saturday, 24 November 2018

मेरे एहसास हो तुम

तुम्हे कभी पा नहीं सका
पर एक बड़ी उम्र भर से
तुम्हें खो भी नहीं सका
किसी एक पल भी

अपनी स्मृतियों में अमिट हो
मैं अकेला रहना चाहता हूँ
तो सामने खड़े हो जाते हो
आकाश में विचरते बादलों में
उड़ते रुई के फाए जुड़ जुड़ कर
तस्वीर बना डालते है तुम्हारी
और मैं मगन हो लेता हूँ

मगन हो लेता हूँ
जैसे तुम यहीं हो
आस पास, अंदर बाहर
मेरे एहसास हो तुम
कुनमुनी धूप हो
अनछुई छुअन हो
क्या इतना काफ़ी नही है
मेरे जीने के लिये

Sunday, 4 November 2018

किताब और जीवन का अनुक्रम

किताब और जीवन का अनुक्रम 

किताब का वह अनुक्रम 
..क्या जीवन की अनुक्रम है?
किताब की कुछ कविताएँ
कहती हैं यह पन्ना मेरा है
कुछ पन्ने कहते हैं
सुनो! यह कविता मेरी है
कहीं पते पन्ने हैं
तो कहीं कविता पता बन गई
ऐसे ही..
कहीं जीवन के रिश्ते हैं
तो कहीं रिश्तों में जीवन है
कहीं जीवन के अनुबन्ध हैं
तो कहीं अनुबन्धों में जकड़ा जीवन
कोई रास्ते बनाते बनाते खप जाता है
तो कोई रास्तों पर चलते चलते
जीवन नाव की तरह चपटा नही
जो तैर कर तर जाए
दो पहियों की गाड़ी पर चलता है यह
हाँ; जिस तरह किताब समग्रता है
जीवन एक समग्रता है
समय बैल की तरह खींचता है यह गाड़ी
साँसों की धुरी पर
धुरी पर घूमता है जीवन
साथ साथ ही घूमते हैं
कुछ साबुत, कुछ टूटे रिश्ते
यह सत्य अनावृत करता हूँ
साँस रोक कर सुनो!
साँस खत्म तो रिश्ते खत्म
साँस खत्म तो अनुबन्ध खत्म
रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन