भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
तू करुण रसधार है, हूँ मैं विरल निश्वास। नील नभ की पाँख है तू मैं तृषित अहसास।।
मानिनी मन मोद की तू , मैं विखण्डित तार। ज्योत्सना है तू शरद की, मैं शिशिर का ज्वार।।
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