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Monday, 26 November 2018

दो दो नयन

स्वप्न भी उच्छृंखल हो गए हैं
कभी नींद उड़ा देते हैं
तो कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखते हैं माटी का गेरूआ रंग
ठहर जाता है वक्त किसी
बौराए आम की घनी छाँव में
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
बस नयन ही कहते रहे
सुनते ही रहे नयन
हमारे अयन

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन