हमारे स्वप्न भी
उच्छृंखल हो गए हैं
कभी ये नींद उड़ा देते हैं,
कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखता हूँ माटी का गेरूआ रंग
बौराए आम की घनी छाँव मे
ठहर जाता है वक्त किसी
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
उन्मत्त स्वाँसों की
महक उठती है निशिगंध
*
*
Monday, 26 November 2018
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About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन
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