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Sunday, 4 November 2018

किताब और जीवन का अनुक्रम

किताब और जीवन का अनुक्रम 

किताब का वह अनुक्रम 
..क्या जीवन की अनुक्रम है?
किताब की कुछ कविताएँ
कहती हैं यह पन्ना मेरा है
कुछ पन्ने कहते हैं
सुनो! यह कविता मेरी है
कहीं पते पन्ने हैं
तो कहीं कविता पता बन गई
ऐसे ही..
कहीं जीवन के रिश्ते हैं
तो कहीं रिश्तों में जीवन है
कहीं जीवन के अनुबन्ध हैं
तो कहीं अनुबन्धों में जकड़ा जीवन
कोई रास्ते बनाते बनाते खप जाता है
तो कोई रास्तों पर चलते चलते
जीवन नाव की तरह चपटा नही
जो तैर कर तर जाए
दो पहियों की गाड़ी पर चलता है यह
हाँ; जिस तरह किताब समग्रता है
जीवन एक समग्रता है
समय बैल की तरह खींचता है यह गाड़ी
साँसों की धुरी पर
धुरी पर घूमता है जीवन
साथ साथ ही घूमते हैं
कुछ साबुत, कुछ टूटे रिश्ते
यह सत्य अनावृत करता हूँ
साँस रोक कर सुनो!
साँस खत्म तो रिश्ते खत्म
साँस खत्म तो अनुबन्ध खत्म
रामनारायण सोनी

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