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Thursday, 8 February 2018

भीतर आओ ना


कुछ पलों की चाहना है
तुमसे, तुम्हारे अंतरंग से
मैं वहाँ हूँ, वहीं तो हूँ
चुपचाप,
तुम्हारे इन्तजार में
भीतर लौट आओ

पदचाप मैं तुम्हारी सुनती रही
रागिनी जो प्रीत की, अनुराग की है
लौट गए तुम बिन खटखटाए
द्वार की कुण्डी,
धड़कनें अलाप रही

सुनो ना!
गुम न जाए अनन्त व्योम में
आओ ना!
लौट आओ!
लौट आओ, दीप बुझने से पहले
नयन - नीर, चुकने से पहले
मैं यहाँ हूँ, यहीं तो हूँ
चुपचाप! चुपचाप!!


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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन