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Friday, 16 February 2018

यहीं कहीं हो

एक ख्याल आता जाता रहा
छू-छू कर अन्तस को
बन चुका अपने
बेनाम रिश्ते की,
रिश्ते की एक पहचान

लगता था/लगता था कि
जैसे तुम यहीं कहीं हो
एक आवाज जब-तब
गूँजती ही रहती है
कानो की खोखली कन्दराओं में 

निखालिस खाली पलों में
न जाने अब तुम कहाँ हो?
देखा है सुनसान
ढहते प्राचीरों के
उड़ते धूलों के गुबार
उस पार - इस पार
पर न जाने तुम कहाँ हो?

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन