भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
धरा ने कब देखा है बीज उल्टा गिरा कि सीधा उसने बस उगा दिया
फिर जडों को सहेजा पोषण भी किया न चाह, न अपेक्षा बस कर्म ही कर्म और धर्म ही धर्म
धरा जब धरती है तो उसमें माँ उभरती है
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