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Monday, 12 February 2018

*पंख धरे पल*

*पंख धरे पल*

मधुमास बौराया
गुलाब के हसीन सुर्ख फूल
कुछ पल महक कर
जिन्दगी महका गए हैं।

गोद में रखा सिर
उन गहरे कुंतलों में
मुस्कराते चाँद से
मन चकोर बनता है।

यादों के बिछौनो पर
मन करवटें लेता है,
कभी तपती धूप को
दुशाला बना कर ओढ़ता है।

घने उस बरगद के तले
गहन शान्त खड़े
नीरव से शिवालय की
घनघनाती घंटियों की आवाज

तैरती हुई आ है
मन निनादित सा है
तो कभी उस अमराई में
कोयल कूक उठती हैं

मुँदे-अधमुँदे नयन अभिराम
उन्नत सा भाल ललाम
भूख से भरा पेट, मन तरबतर
कौर आधे-आधे बँटे-बँटे

अधरों पर उन पोरों की छुअन
आज भी गुदगुदाती हैं
मधुमास; फिर मधुमास है

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन