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Monday, 22 July 2019

गुड़िया बन जाऊँ

देखता हूँ जब कभी
चहकते ठुमकते बच्चे को
उन्मुक्त खेलते हुए
जी करता है जी भर कर
वह बच्चा तुम हो जाओ
और मैं हो जाऊं
तुम्हारे हाथों की गुड़िया

सोचता हूँ कभी कभी
छिदी बिंधी बासुरी
बन कर के मैं
अधरों से लग जाऊँ
थोथापन यह है मेरा
एक फूँक से तुम्हारी
मैं रागों से भर जाऊँ

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन