करुणा की मेरी झोली में
केवल बासी दर्द भरे हैं
यह कैसा ही बौनापन है
हम हँसने में भी डरे हैं
अनजाने लोगों ने आकर
खुले व्रणों पर नमक धरे हैं
रात गई और प्रात हुई पर
नयन अभी भी नीर भरे हैं
ढली शाम और थके पाँव
विषदंशों के स्राव हरे हैं
हम निर्मम की इस बस्ती में
कितने बेबस आज घिरे हैं
आज इलाजों की मण्डी में
शातिर नश्तर बाज भरे है
कोई जिये मरे कोई भी
सौ सौ पाकिटमार भरे हैं

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