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Monday, 22 July 2019

सूखी नदी

तुम नदी हो
एक बहती नदी
रुकोगी नही,
वापस मुड़ोगी भी नही
मैं खड़ा रहा
बाहें फैलाये
समुन्दर बन कर
कि तुम पहुँचोगी
जरूर एक दिन
मुझ तक

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन