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Wednesday, 29 January 2020

काले उजाले

क्या तुम्हारी
मेरी, 
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन