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Thursday, 9 January 2020

तुम ही हो

समीर उसे छू कर क्या आया
दिशाएँ महक उठी

मेघ कोई संदेश क्या लाया 
 कि उम्मीदें दौड़ पड़ी

आँगन का बिरवा यूँ खिलखिलाया
 कि बाछें खिल गई

मन के नगर की अट्टालिकाएँ
 आतुर हो उठी दरस को

     मैं जानता हूँ
       कि वह तुम ही हो!
         हाँ, तुम ही!!

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन