*

*
*

Wednesday, 29 January 2020

स्वप्न सारे ढह गए


अस्तबल में हिनाहिनाहट, थी गिन्नियों की खनखनाहट।
देखते ही देखते सब बिक गए, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

सब वचन तख्तियाँ टूटी पड़ी है, बस छलावों का ही कद ऊँचा हुआ।
उन मतों की मौत का मातम लिये, हम घुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

वक्त ने भी बीत कर हमको छला, पाँच वर्षों बाद लौटेगा कभी।
ले मुकद्दर की लकीरें हाथ में, हम मिटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

फिर दुःशासन के कुशासन में फँसी, लोकतंत्री द्रौपदी की लाज है।
उँगलियों में ले सुदर्शन आज इन, हम जुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।

उँगलियों की स्याही भी सूखी नही, पालियों की वे लकीरें मिट गई।
खेल हैं या हैं तमाशे ये सभी, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

अब हमें कानून ऐसा चाहियेगा, गर बदलते बीच में तुम पन्थ अपना।
मान्यता ही खीच लें वापस तेरी, हम तुम्हे इतना भी क्यों सहते गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

रामनारायण सोनी
२९।०१।२०२०

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन