यह समय उड़ता रहेगा श्वेत काले पंख ले कर
रुक नही जाना पथिक रात का अँधियार ले कर
फेंक दो तुम आज मन से हीनता के पंक को
राजपथ पर आ मिलो छोड़ गलियों की घुटन को
इन पलों के गर्भ में तो स्वप्न पाँखी पल रहे हैं
आँधियों की छातियों पर हिमशिखर भी गल रह हैं
इन पलों की कुक्षियों में वीर गाथाएँ भरी है
अश्रुओं के शाप से वे वीर बाला कब डरी हैं
इन पलों में ज्योत्स्ना का झर रहा पीयूष नभ से
सन्दली बहती पवन है रात काली फेंक मन से
इन पलों के सर्ग सारे हैं गढ़े नेपथ्य में ही
चल रहे संवाद जो भी हैं बुने संदर्भ में ही
इन पलों के साक्ष्य में ही काल निर्णय हो सकेगा
पथ चुनोगे, श्रम करोगे संग में पाथेय होगा
इन पलों की साँझ को संध्या बना कर देख लेना
संधि के सुरमई सरोवर में उतर कर डूब लेना
इन पलों में धड़कनों में श्वास है निःश्वास भी है
विष बुझे कुछ तीर है अमरता का वास भी है
इन पलों में शतदलों का पंक में जीवन पला है
शूल के आँगन मुदित हो पुष्प कोई आ खिला है
इन पलों की मांग में तुम साध का सिन्दूर भर लो
सिंह शावक बन विटप में इक नई हुंकार भर लो
इन पलों की भृकुटि में ही तुम त्रिलोचन देख डालो
विघ्न के अभिषाप सारे ज्वाल से तुम भून डालो
इन पलों को मुफ्त में ही जो कोई भी खो रहा है
जिन्दगी में लाश अपनी आप काँधे ढो रहा है
इन पलों के घोष को जयघोष का उत्थान दे दो
भींच कर के मुट्ठियाँ तुम कर्म को आह्वान दे दो
इन पलों में चक्रधारी की प्रतीक्षा व्यर्थ होगी
चीर उसका ही बचेगा जो स्वयं ही पार्थ होगी
उन पलों की स्वस्ति में इन पलों को क्यों गँवाना
इन पलों में फिर धरा पर बीज कर्मों के उगाना
रामनारायण सोनी

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