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Friday, 24 September 2021

लौट भी आओ!

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ
ये गुल्म और लताएँ
मन और सारी आशाएँ
ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं
अब लौट भी आओ शुभे!
मेरे उस महाप्रयाण से पहले

रामनारायण सोनी
२४.०९.२१


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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन