मैं
और जीवन यह मेरा
दीवार पर टँगे दर्पण सा
कैसा यह बीत गया
रीता और क्रपण सा
लोग आये, लोग गये
अपने तन लेकर
और अपने मन लेकर
चुटकी भर धूल
लिपटी ही रही
जीवन के इस दर्पण पर
शायद देख नहीं पायेगा
रीतापन जीवन का
रामनारायण सोनी
५.९.२१
कितनी मजबूर है
उड़ने को चिड़िया
तैरते रहने को मछली
बहने को यह समीर
उठने को धुआँ
मैं भी
तुम्हें निरन्तर याद करने को
रामनारायण सोनी
५.९
दमकता मुखड़ा
उस सुर्ख गुलाब का
सौंदर्य और सुवास से सिक्त
अभिभूत और स्तब्ध हो
धरती के आँगन में
देखता ही रह गया मैं
और यह क्या कमाल हो गया?
यकायक महक उठा है
सारा का सारा
मेरे भीतर का उपवन
हे शुभे!
एक से ही तो हो तुम दोनों
रामनारायण सोनी

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