वो क्या चीज़ है कि
चोट मुझे लगे और दर्द तुम्हें हो
गर मैं खुश नहीं रहता हूँ
तो तुम भी उदास हो जाते हो
गर मैं सोता हूँ
तो सिरहाने बैठे जागते रहते हो
जैसे ही मैं कुछ बोलने जाता हूँ
वह कहने के पहले ही
तुम्हारे मुँह से निकलने लगता है
जैसे ही हम चुप होते हैं
चुप्पियाँ जोर जोर से बतियाने लगती हैं
जो जुबाँ नही कह सकी
वह दिल बोलता है, आँखे बोलती है
वे बातें बस तुम्हारी हमारी
मुझमें तुम महसूस होने लगते हो
पूरी सिद्धत से
और शायद तुम में भी मैं उसी तरह
क्यों? क्या रूहें घर भी बदलती हैं?
तुम मुझे यहाँ ढूँढते हो
और मैं तुम्हें वहाँ
जब लौटता हूँ तो तुम्हें
हाँ तुम्हें, मुझी में तुम्हें पाता हूँ
क्या यह अलौकिक प्रेम नहीं है?
एक दम निश्छल, अविरल, अविचल
शायद प्रेम यही है, हाँ बिल्कुल यही है
प्रेम वह परमात्म अनुभूति है
रामनारायण सोनी
२९.७.२१

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