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Thursday, 22 September 2016

जवाब के सवाल

  जवाब के सवाल

मीत मेरे!

मैनें मना लिया, जब भी तुम रूठे
मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन,
तूफान में घिरी है कश्ती
साहिल पर लगाएगा कौन,
सवाल के जवाब हजारों हैं
पर पल पल चुभते जवाबों के
सवालों को बुझाएगा कौन,

पतझार तो हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
सपनीली यादों का अक्स लिए
फूल जो किताब में सूख गया
खुशबू अब लौटाएगा कौन
पथराए नयन राहों को देख देख
अंबर में फैल रही बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन,

अपने इन सवालों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन

मैनें मना लिया, जब भी तुम रूठे
मैं रूठा अब मनाएगा कौन

Thursday, 15 September 2016

दरकते सवाल

लुढ़कते आँसू
दरकते सवाल

हाथों की उलझती रेखाएँ,
मरी-मरी मानवी संवेदनाएँ

बेपैर घिसटती जिन्दगी
खुद में सिमटता आदमी
मिट्टी से निकले हीरे
मिट्टी से ही बेखबर
पत्थर से निकली मूरत
पत्थर से नफरत
कैसी ये उलटबासियाँ

एक विप्लव न हो जाए
एक आघात न ठहर जाए
इस दलदली जमीन में
कोई बारूद न भर जाए
इससे पहले कि संवेदनाएँ
कपूर की तरह उड़ जाए

एक बढ़ा हाथ चाहिए
एक अदद साथ चाहिए
उसे काँटा लगे तो
यहाँ चुभन चाहिए
कुछ करो न करो दोस्त
दो बूँद मरहम की
दिलों के बीच चाहिए
दम न घुटे इस जिन्दगी का
एक चुटकी साँस चाहिए
एक झप्पी, एक दुलार चाहिए

निवेदक
रामनारायण सोनी

बसन्ती बयार

🌊 बसन्ती बयार 🌊

मैं नहीं जानता हूँ सुरों का नगर
शब्द बसते कहाँ कौनसी है डगर।
बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

एक बहकी हवा जुल्फ लहरा गई
ओट में छुप रहा चाँद दिखला गई।
अर्श से फर्श तक आज महकी फिजा
रूप की चाँदनी मुझको नहला गई।।

फूले टेसू अमलतास कचनार है
हो गई गुलसिताँ मन की सिगरी गली।।
ओढ़ लो अब बसंती चुनर तुम प्रिये
आज मौसम स्वयं बन उठा संदली।

बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

रामनारायण सोनी

Thursday, 8 September 2016

एहसास हमारे होने का

🐥एहसास हमारे होने का🐤

जब तुम न थे
न राग था न रंग थे
अनबूझे इन अधरों पर
प्यास थी न गीत थे
तुम आये, सब लाए
जाने क्यों मन भाए
कुनमुनी प्रीत जगी,
सूने से आँगन के
पीपल की टहनी पर
चंचरीक चहक उठी
जीवन में चाह जगी
कैसे तुम दबे पाँव, चुपके से
हाँ! जीवन में ऐसे तुम आए

फिर!.

जाग उठी संवेदना,
गिरता आत्मविश्वास,
गहराती खामोशियॉ,
एहसास हमारे होने का
और फिर एहसास न होने का,

एक अस्तित्व मेरे होने का
एक आभास तुम्हारे होने का
तुम्हारे संग का असंग का
संग की प्यास का
असंग की पीड़ा का
गाँठ है भारी गठरी सी
यादें भी भरी-भरी सी
पर मन की सभी वीथियाँ
फिर भी क्यों खाली है
चाँदी सी चाँदनी में
रजनी क्यों काली है।

बिछा लिया सुख तो
ओढ़ना दुःख, क्या नियति है?
बुन लिए गर स्वप्न तो
टूटना-बिखरना क्या नियति है?
कभी न समझ पाया मैं
एक बार में एक ही मिलेगा
तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
नहीं समझ पाया कभी
दोनों में जलन उतनी ही
तुषार या हो अंगार

मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन
पतझार हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
फूल तेरा सूख गया पुस्तक में
खुशबू अब लौटाएगा कौन
अंबर में फैली इन बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन
अपने इन प्रश्नों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन
कौन? कौन? कौन?

तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
या एहसास हमारे होने का।

Friday, 22 July 2016

मुक्तक

इस ह्रदय की पीर गल कर, शब्द बनता काव्य है 
काँपती ध्वनियाँ नहीं ये वेदना के घाव हैं 
अश्रु कोरों में रुके जो, मर्म ही का स्राव है 
श्वाँस के हिम खण्ड झरते, क्रन्दनों के भाव हैं 
जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।
खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।
मैनें भ्रम पाला, इसी क्षितिज, आकाश धरा से मिलता है 
दो कूल नदी के खड़े निकट, कभी नहीं कोइ मिलता है
चट्टानों से बहते सोते, शायद,  दिल उसका ही झरता है 
मेरा प्रतिबिम्ब दिखा मुझको ही, क्यों दर्पण यूँ रोता है 

Thursday, 25 February 2016

भाव निर्झर



भाव निर्झर 
चुपके चुपके कुछ कहते हैं 
आसमान के झिल मिल तारे 
भाव  भरे हैं ऐसे ही 
देखो ये शब्द हमारे 












 मिताली 

Monday, 11 January 2016

आँसू


आँसू


आँसू
तरह तरह के,
पर सभी खारे आँसू.

प्रेम के, ख़ुशी के आसू
रुदन के, विलाप के आँसू
कुटिलता के, मगरमच्छ के आँसू

प्रेम के, रुदन के गर्म हैं आँसू
पानी न समझ लेना मर्म है आँसू
ह्रदय भरे भावों से उगलता
तन-मन को भिंगो देता आँसू

अपनी जुबाँ में बोलते है आँसू
धडकनों का पता देते आँसू
अंतर के भेद खोलते आँसू
वेदना के उबलते आँसू
अपने संग हमें ले चलते है आँसू


अंचल में झेलता कोई आँसू 
अंजन को घोलता कोई आँसू 
करुणा से हमें डुबोता कोई आँसू 
दिल को गुदगुदाता कोई आँसू 
अंतस में उतरता कोई आँसू 
दिल के छाले बताता कोई आँसू
कोई साथ सिसकी भी लाता है आँसू
कोई प्रेम गंगा बहाता है आँसू
कोई भक्त मधुबन में बोता है आँसू
कोई दोस्त रिश्ते को धोता है आँसू

आँसू
तरह तरह के,
पर खरा ही होता है 
हर एक आँसू.

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन