*

*
*

Thursday, 15 September 2016

बसन्ती बयार

🌊 बसन्ती बयार 🌊

मैं नहीं जानता हूँ सुरों का नगर
शब्द बसते कहाँ कौनसी है डगर।
बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

एक बहकी हवा जुल्फ लहरा गई
ओट में छुप रहा चाँद दिखला गई।
अर्श से फर्श तक आज महकी फिजा
रूप की चाँदनी मुझको नहला गई।।

फूले टेसू अमलतास कचनार है
हो गई गुलसिताँ मन की सिगरी गली।।
ओढ़ लो अब बसंती चुनर तुम प्रिये
आज मौसम स्वयं बन उठा संदली।

बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

रामनारायण सोनी

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन