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Thursday, 15 September 2016

दरकते सवाल

लुढ़कते आँसू
दरकते सवाल

हाथों की उलझती रेखाएँ,
मरी-मरी मानवी संवेदनाएँ

बेपैर घिसटती जिन्दगी
खुद में सिमटता आदमी
मिट्टी से निकले हीरे
मिट्टी से ही बेखबर
पत्थर से निकली मूरत
पत्थर से नफरत
कैसी ये उलटबासियाँ

एक विप्लव न हो जाए
एक आघात न ठहर जाए
इस दलदली जमीन में
कोई बारूद न भर जाए
इससे पहले कि संवेदनाएँ
कपूर की तरह उड़ जाए

एक बढ़ा हाथ चाहिए
एक अदद साथ चाहिए
उसे काँटा लगे तो
यहाँ चुभन चाहिए
कुछ करो न करो दोस्त
दो बूँद मरहम की
दिलों के बीच चाहिए
दम न घुटे इस जिन्दगी का
एक चुटकी साँस चाहिए
एक झप्पी, एक दुलार चाहिए

निवेदक
रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन