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Thursday, 22 September 2016

बरगद और बाशिन्दे

बरगद और बाशिन्दे


बरगद की साखों पर पातों के झुरमुट में
शयन किये पंछी हैं राका के नीरव में।
गद्गद् हो देख रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

रोज  सुबह इनकी तो ऐसी ही आती है
सुनता हूँ भैरव का आरोहण अवरोहण।
सुनता हूँ जीवन की उमगों का स्पंदन
झूम-झूम उठता है पुलकित हो मेरा मन।।

रोली सी फ़ैल गई प्राची के अम्बर में
चिचियाते चूज़े भी भूख भरे चोंच में।
आतुर हो उचकाते पंखों को सोच में
मैं भी कल ऐसे ही नापूँगा अम्बर को।।

गद्गद् हो देख .रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

पेड़ की पीड़ा

यह पेड़ भी बड़ा अजीब है

१.
जो उसे काटने आया
उसे भी छाया दे रहा है,
उसे भी प्राणवायु दे रहा है,
उसे भी फल दे रहा है,
उसे भी प्यार दे रहा है,
यह पेड़ भी बड़ा अजीब है

इसमेंं भरा सत्य है,
अजस्र प्रेम है,
पलती कोमल करुणा है,
रग-रग में कर्मयोग सना है,
यह सहिष्णु भी है,
और पालक विष्णु भी है,
शंकर सा विष पीकर
जगती के जीवन हित
बस प्राण ही उगलता है
यह पेड़ भी कितना सजीव है

तपती धूप को ओढ़ता है,
तूफान को तोड़ता है।
धरा-गगन को जोड़ता है
जमीं पकड़ कर खड़ा है,
सबसे मेरे लिये लड़ा है।
२.
अचरज से भरता है-
हर कुल्हाड़े में मैं हूँ
दुश्मन और दोस्त की,
खिड़की मे मैं हूँ
दर पर आगन्तुक की
दस्तक में मैं हूँ
घर की चौखट में,
देवों के मंदिर में मैं हूँ
बालक के पलने में और
विदा होते मानव संग में मै हूँ
३.
कातर हो तरुवर ने
अनुनय यह भेजी है
जीवन जो मेरा है
जीता हूँ तेरे हित
मर कर भी जीता हूँ
बस केवल तेरे हित
असमय में मुझे मार
सब कैसे जी पाओगे

मेरे अन्तर की
पीड़ा है बस इतनी ही
मेरे जीने की
प्यास नहीं यार मेरे
मेरे बिन इस जग में
सब कैसे जी पाओगे।


सोनं चिरैया

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?
सुन कर आँखें छलक गईं। 
उसने कहा अभी मेरे पर
बाँधो टहनी से कस कर 
अब हम संग रहेंगे हरदम
और जिएँगे जी भर-भर कर

तभी जोर का झंझा आया,
चिड़िया मन ही मन घबड़ाई
प्यार से वह बोला प्रिये तुम
उड़ जाओ मैं उड़ न सकूँगा
जाते-जाते चिड़िया बोली 
प्रियतम अपना ध्यान रहे।
...

जब तूफान थमा 
एक यथार्थ सामने खड़ा था
सूनी उस टहनी पर
वह बेजान टँगा पड़ा था
बाहर के तूफान से
भीतर का तूफान बड़ा था।
मौत से तो कई बार लड़ा पर 
जिन्दगी से पहली बार लड़ा था
हार कर जीतना चाहा पर
जीत कर हारना उससे बड़ा था

प्रीत की चादर बुनी थी
तार तार क्यों हो गई
झोलियाँ विश्वास की अब
जार जार क्यों हो गई
शाम होने से भी पहले
रात का अंधियार क्यों है 
सोम झरती चाँदनी में
गिर रही विषधार क्यों है।

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?

जवाब के सवाल

  जवाब के सवाल

मीत मेरे!

मैनें मना लिया, जब भी तुम रूठे
मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन,
तूफान में घिरी है कश्ती
साहिल पर लगाएगा कौन,
सवाल के जवाब हजारों हैं
पर पल पल चुभते जवाबों के
सवालों को बुझाएगा कौन,

पतझार तो हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
सपनीली यादों का अक्स लिए
फूल जो किताब में सूख गया
खुशबू अब लौटाएगा कौन
पथराए नयन राहों को देख देख
अंबर में फैल रही बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन,

अपने इन सवालों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन

मैनें मना लिया, जब भी तुम रूठे
मैं रूठा अब मनाएगा कौन

Thursday, 15 September 2016

दरकते सवाल

लुढ़कते आँसू
दरकते सवाल

हाथों की उलझती रेखाएँ,
मरी-मरी मानवी संवेदनाएँ

बेपैर घिसटती जिन्दगी
खुद में सिमटता आदमी
मिट्टी से निकले हीरे
मिट्टी से ही बेखबर
पत्थर से निकली मूरत
पत्थर से नफरत
कैसी ये उलटबासियाँ

एक विप्लव न हो जाए
एक आघात न ठहर जाए
इस दलदली जमीन में
कोई बारूद न भर जाए
इससे पहले कि संवेदनाएँ
कपूर की तरह उड़ जाए

एक बढ़ा हाथ चाहिए
एक अदद साथ चाहिए
उसे काँटा लगे तो
यहाँ चुभन चाहिए
कुछ करो न करो दोस्त
दो बूँद मरहम की
दिलों के बीच चाहिए
दम न घुटे इस जिन्दगी का
एक चुटकी साँस चाहिए
एक झप्पी, एक दुलार चाहिए

निवेदक
रामनारायण सोनी

बसन्ती बयार

🌊 बसन्ती बयार 🌊

मैं नहीं जानता हूँ सुरों का नगर
शब्द बसते कहाँ कौनसी है डगर।
बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

एक बहकी हवा जुल्फ लहरा गई
ओट में छुप रहा चाँद दिखला गई।
अर्श से फर्श तक आज महकी फिजा
रूप की चाँदनी मुझको नहला गई।।

फूले टेसू अमलतास कचनार है
हो गई गुलसिताँ मन की सिगरी गली।।
ओढ़ लो अब बसंती चुनर तुम प्रिये
आज मौसम स्वयं बन उठा संदली।

बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

रामनारायण सोनी

Thursday, 8 September 2016

एहसास हमारे होने का

🐥एहसास हमारे होने का🐤

जब तुम न थे
न राग था न रंग थे
अनबूझे इन अधरों पर
प्यास थी न गीत थे
तुम आये, सब लाए
जाने क्यों मन भाए
कुनमुनी प्रीत जगी,
सूने से आँगन के
पीपल की टहनी पर
चंचरीक चहक उठी
जीवन में चाह जगी
कैसे तुम दबे पाँव, चुपके से
हाँ! जीवन में ऐसे तुम आए

फिर!.

जाग उठी संवेदना,
गिरता आत्मविश्वास,
गहराती खामोशियॉ,
एहसास हमारे होने का
और फिर एहसास न होने का,

एक अस्तित्व मेरे होने का
एक आभास तुम्हारे होने का
तुम्हारे संग का असंग का
संग की प्यास का
असंग की पीड़ा का
गाँठ है भारी गठरी सी
यादें भी भरी-भरी सी
पर मन की सभी वीथियाँ
फिर भी क्यों खाली है
चाँदी सी चाँदनी में
रजनी क्यों काली है।

बिछा लिया सुख तो
ओढ़ना दुःख, क्या नियति है?
बुन लिए गर स्वप्न तो
टूटना-बिखरना क्या नियति है?
कभी न समझ पाया मैं
एक बार में एक ही मिलेगा
तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
नहीं समझ पाया कभी
दोनों में जलन उतनी ही
तुषार या हो अंगार

मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन
पतझार हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
फूल तेरा सूख गया पुस्तक में
खुशबू अब लौटाएगा कौन
अंबर में फैली इन बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन
अपने इन प्रश्नों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन
कौन? कौन? कौन?

तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
या एहसास हमारे होने का।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन