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Monday, 16 January 2017

मैं हूँ अधूरा
















मैं आदमी हूँ अधूरा
कुछ अधूरा-अधूरा 
कुछ खाली-खाली 
पर तुम्हारा अजस्र प्रेम
इस अधूरे-पन की 
पूर्ति में अनवरत लगा है

अधूरा रहना चाहता हूँ मैं
क्योंकि तुम फिर-फिर
प्रेम उंढेलते रहोगे इसमें
मैं भरता ही जाऊँगा
तुम तो दाता रहोगे
मैं अघाता ही रहूँगा

प्यास प्रेम की बुझे न कभी
आस पाने की घटे न कभी
डरता हूँ इस कदर कि
बुझते ही प्यास
तुम चले जाओगे
छोड़ी जो आस 
तो लौट कर न आओगे
इसलिये सुनो प्राण!
मैं अधूरा रहना चाहता हूँ
प्रेम को, तुमको
किसी भी मूल्य पर
खोना नहीं चाहता हूँ।



जगदात्मा



रोशनी इन चिरागों की अपनी नहीं है
अगर होती इनकी तो हरगिज न बुझते।
अगर कुछ मिटा है तो तैल और बाती
मगर हम चिरागों को रोशन समझते।।

न टपके अगर नूर की बूँद उसकी 
घटाटोप अंधियार जग का न जाता।
रोशनी है वो ही रोशनी है उसी की
वो ही चेतना बन के हम में समाता।।

यहाँ भी वही है और वहाँ भी वही 
वही दूर भी है वही पास सब के।
न जाता न आता सदा सत्य ही है
बाहर वही है और भीतर भी सबके।।

पता ही नहीं चला


मेरे दिल में
कैसे और कब सेंध लग गई
पता ही नही चला
कुछ चुराने के बजाए
इसे पूरा का पूरा भर गया
पता ही नहीं चला

महकता है ये रात दिन
छिड़क गया पराग कोने-कोने
पता ही नहीं चला
चुरा ले गया मुझे मुझसे ही 
भर दी प्रेम की अकूत दौलत
पता ही नहीं चला।

जब तब आता है दबे पाँव
गुदगुदाता है अन्तस को
चुभा चुभा कर तर्जनी
दिल कचहरी में 
जालियों की ओट से
चला गया झाँक कर वही
पता ही नहीं चला

छुईमुई

मैं छुईमुई को छूने से डरता हूँ
कितनी सुन्दर है, सजल है
नैसर्गिक लय है इसमें
सुकुमार है
देखता हूँ उसे में निगाह भर भर
शायद देखती है वह भी मुझे 
तिरछी चितवन से लजा कर
कह रही हो जैसे सहम कर


छूते ही वह सिकुड़ जाएगी

कलम पर कोई बैठ जाता है

कलम पर कोई बैठ जाता है
कभी मैं अपने हाथ को
तो कभी कलम को देखता हूँ
बन करके वो सियाही मेरे
पन्नों पे उतर आता है

बन गया है गीत कोई या बनी गज़ल
लिखता वही हूँ केवल जो
तू आखों से बोल  जाता है



🌺कैसे संगतराश हो तुम🌺


कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश हो तुम
दलदली रास्ते पर पड़े बेहूदा, 
सख्त काला बेडौल सा पत्थर
रोज गुजरते हैं और मारते ठोंकर
आते जाते अच्छे बुरे लोग मुझ पर
क्यों डाल रहे हो श्रम का बीज
एक ऊसर, बंध्या सूखी मिट्टी में 
उगती नहीं सरसों कभी हथेली पर
क्यो ढूँढते रहते हो सोते मरुथल में
कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश हो तुम

नियति रही है तुम्हारी जिद करना
देखता हूँ अजीब से औजार पैने
तुम्हारे इन उतावले कर्मठ हाथों में
देखता हूँ अजीब से बड़े बड़े सपने
तुम्हारी इन बड़ी बड़ी आँखों में
देखता हूँ तुम्हारे कोमल हृदय को
तलाशता कुछ अनोखा सा मुझमें 
सुनता हूँ रोज छैनियोँ की छनकार
कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश हो तुम

रोज कुछ-कुछ होता है कम मुझ में
मुस्कुराते हो मेरे किसी दर्द में कभी 
इतराते मुझ अधूरे-अधूरे पर कभी
झलकूँ जरा तुम्हारी आँख में कभी
छूता मुझे मैं नहीं, छूते हो तुम
देखता मुझे मैं नही, देखते हो तुम
आँकता मुझे मैं नहीं, आँकते हो तुम
फैल सी जाती है तुम्हारी आँखें अकसर
जब दूर खड़े हो कर, निहारते हो तुम
जाने क्या नाम धर कर, पुकारते हो तुम

क्या हूँ मैं? यह कई लोग जानते हैं
क्या हो तुम? यह, सिर्फ मैं जानता हूँ
मुझे तुमसे जोड़ कर लोग जानते हैं
तुम्हें मुझसे जोड़ कर, सिर्फ मैं जानता हूँ
रास्ते के पत्थर को लोग जानते हैं
आँगन के सभी बुत तुम्हें देखते होंगे
तुम्हारी प्यारी सी हँसी, सिर्फ मैं जानता हूँ
लिपट जाते हो जब प्यार भर कर तुम मुझ से
क्या से क्या हो गया, सिर्फ मैं जानता हूँ

कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश तुम हो

     !क्या हो तुम!

चाँद मेरे



बदलते ही रहते हो चाँद क्यों  तुम सदा
रिश्ते में मेरे कभी पुए पकाते मामा थे 
थाली के पानी में आहिश्ता जो उतरे थे
छूते ही मेरे तब हो कतरा कतरा बिखरे थे।।

उम्र तुम्हारी भी मेरे संग इस तरह चली है
तब रोशनी थी तब जो चाँदनी लगती है
बैठी वह बुढ़िया किस्से जो कहती थी
आज तुम्हीं में सजनी मेरी दिखती है।।

लोरी तुम गाते थे नींद उतर आती थी
अब तुम आते हो तो चैन लिये जाते हो
जाते हो अपने संग चाँदनी ले जाते हो
रातों के सियाह साये मुझे सौंप जाते हो।।

क्या खूब लगे कुटिया के जब फूँस से झाँके
पूनम को झील उतरे फर सी पसार पाँखें
कभी हम साहिल कभी नाव कभी तुमको
राह उनकी तो कभी सुलगती चाँदनी देखें।।

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