कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश हो तुम
दलदली रास्ते पर पड़े बेहूदा,
सख्त काला बेडौल सा पत्थर
रोज गुजरते हैं और मारते ठोंकर
आते जाते अच्छे बुरे लोग मुझ पर
क्यों डाल रहे हो श्रम का बीज
एक ऊसर, बंध्या सूखी मिट्टी में
उगती नहीं सरसों कभी हथेली पर
क्यो ढूँढते रहते हो सोते मरुथल में
कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश हो तुम
नियति रही है तुम्हारी जिद करना
देखता हूँ अजीब से औजार पैने
तुम्हारे इन उतावले कर्मठ हाथों में
देखता हूँ अजीब से बड़े बड़े सपने
तुम्हारी इन बड़ी बड़ी आँखों में
देखता हूँ तुम्हारे कोमल हृदय को
तलाशता कुछ अनोखा सा मुझमें
सुनता हूँ रोज छैनियोँ की छनकार
कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश हो तुम
रोज कुछ-कुछ होता है कम मुझ में
मुस्कुराते हो मेरे किसी दर्द में कभी
इतराते मुझ अधूरे-अधूरे पर कभी
झलकूँ जरा तुम्हारी आँख में कभी
छूता मुझे मैं नहीं, छूते हो तुम
देखता मुझे मैं नही, देखते हो तुम
आँकता मुझे मैं नहीं, आँकते हो तुम
फैल सी जाती है तुम्हारी आँखें अकसर
जब दूर खड़े हो कर, निहारते हो तुम
जाने क्या नाम धर कर, पुकारते हो तुम
क्या हूँ मैं? यह कई लोग जानते हैं
क्या हो तुम? यह, सिर्फ मैं जानता हूँ
मुझे तुमसे जोड़ कर लोग जानते हैं
तुम्हें मुझसे जोड़ कर, सिर्फ मैं जानता हूँ
रास्ते के पत्थर को लोग जानते हैं
आँगन के सभी बुत तुम्हें देखते होंगे
तुम्हारी प्यारी सी हँसी, सिर्फ मैं जानता हूँ
लिपट जाते हो जब प्यार भर कर तुम मुझ से
क्या से क्या हो गया, सिर्फ मैं जानता हूँ
कैसे और क्यों चुन लिया मुझे तुमने
कैसे अजीब संगतराश तुम हो
!क्या हो तुम!

No comments:
Post a Comment