बदलते ही रहते हो चाँद क्यों तुम सदा
रिश्ते में मेरे कभी पुए पकाते मामा थे
थाली के पानी में आहिश्ता जो उतरे थे
छूते ही मेरे तब हो कतरा कतरा बिखरे थे।।
उम्र तुम्हारी भी मेरे संग इस तरह चली है
तब रोशनी थी तब जो चाँदनी लगती है
बैठी वह बुढ़िया किस्से जो कहती थी
आज तुम्हीं में सजनी मेरी दिखती है।।
लोरी तुम गाते थे नींद उतर आती थी
अब तुम आते हो तो चैन लिये जाते हो
जाते हो अपने संग चाँदनी ले जाते हो
रातों के सियाह साये मुझे सौंप जाते हो।।
क्या खूब लगे कुटिया के जब फूँस से झाँके
पूनम को झील उतरे फर सी पसार पाँखें
कभी हम साहिल कभी नाव कभी तुमको
राह उनकी तो कभी सुलगती चाँदनी देखें।।

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