रोशनी इन चिरागों की अपनी नहीं है
अगर होती इनकी तो हरगिज न बुझते।
अगर कुछ मिटा है तो तैल और बाती
मगर हम चिरागों को रोशन समझते।।
न टपके अगर नूर की बूँद उसकी
घटाटोप अंधियार जग का न जाता।
रोशनी है वो ही रोशनी है उसी की
वो ही चेतना बन के हम में समाता।।
यहाँ भी वही है और वहाँ भी वही
वही दूर भी है वही पास सब के।
न जाता न आता सदा सत्य ही है
बाहर वही है और भीतर भी सबके।।

No comments:
Post a Comment