*

*
*

Monday, 16 January 2017

जगदात्मा



रोशनी इन चिरागों की अपनी नहीं है
अगर होती इनकी तो हरगिज न बुझते।
अगर कुछ मिटा है तो तैल और बाती
मगर हम चिरागों को रोशन समझते।।

न टपके अगर नूर की बूँद उसकी 
घटाटोप अंधियार जग का न जाता।
रोशनी है वो ही रोशनी है उसी की
वो ही चेतना बन के हम में समाता।।

यहाँ भी वही है और वहाँ भी वही 
वही दूर भी है वही पास सब के।
न जाता न आता सदा सत्य ही है
बाहर वही है और भीतर भी सबके।।

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन