मैं आदमी हूँ अधूरा
कुछ अधूरा-अधूरा
कुछ खाली-खाली
पर तुम्हारा अजस्र प्रेम
इस अधूरे-पन की
पूर्ति में अनवरत लगा है
अधूरा रहना चाहता हूँ मैं
क्योंकि तुम फिर-फिर
प्रेम उंढेलते रहोगे इसमें
मैं भरता ही जाऊँगा
तुम तो दाता रहोगे
मैं अघाता ही रहूँगा
प्यास प्रेम की बुझे न कभी
आस पाने की घटे न कभी
डरता हूँ इस कदर कि
बुझते ही प्यास
तुम चले जाओगे
छोड़ी जो आस
तो लौट कर न आओगे
इसलिये सुनो प्राण!
मैं अधूरा रहना चाहता हूँ
प्रेम को, तुमको
किसी भी मूल्य पर
खोना नहीं चाहता हूँ।



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