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Wednesday, 23 May 2018

कहाँ आ गए हम


रिश्तों को चबाते रिश्ते
मासूमियत की कव्र पर
खड़ी गर्व की मीनारें
तब पाँच पैसे में मिल गई थी
ढेरों झमाझम खुशियां
अब बेखौफ़ यह
भुट्टे सी अकड़न।।

माटी के दिए की रोशनी
लीलते मेटल हेलाइङ्स
खपरैलों का एयरकंडीशन हुअा दफन
विकास के डोजर तले
रौंदी गई संस्कृति।।

कौड़ी महँगी, जीवन सस्ता
कहाँ आ गए हम?
रास्ते अगर ये हैं
तो गन्तव्य कैसा होगा?
बहता लावा दीखता है
वह ज्वालामुखी कैसा होगा।।

Tuesday, 22 May 2018

राज पथ के राहियों से तौलना मत

लहरिया पगडंडियों का राहगिर हूँ
राजपथ के राहियों से तौलना मत।
मंजिलों की सीढ़ियाँ पर्याप्त मुझको
शिखर छूने की मुझे तुम बोलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

झेलती झंझा उदधि की हूँ मैं लहर
झील की सी शान्ति मुझ में हैं नहीं ।
पा लिया स्पन्द रव का मस्तियों में
वो चाँद की परछाइयाँ मुझ में हैं नहीं।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

छ्त मेरी नित नील तारक से मढ़ी है
पवन झलती मन्द शीतल मलय गंंधी।
है हरित वसना धरा की गोद मुद मय
चाहना फिर स्वर्ग की तुम घाेलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

Monday, 21 May 2018

मातृत्व के बीज

मैं उस माँ का अभिनन्दन करता हूँ
जो इक माँ की ही बेटी है

मैं उस माँ-बेटी का
वन्दन,अर्चन, अभिनन्दन करता हूँ
जिसके कारण हम तुम और सब है

मैं उस बेटी को प्रणाम करता हूँ
जिसमें मातृत्व के बीज पल रहे हैं

मैं उस बेटी का वन्दन करता हूँ
जिसमें नव संस्कृति के
आकार ढल रहे हैं

Friday, 11 May 2018

जिन्दगी के रंग कई रे!


नौ रंगों से है रंगी यह जिन्दगी।
करम-धरम आचार मय है बन्दगी।।

श्वेत तो उस सत्य का संधान है।
रक्त ऊर्जा की परम पहचान है।।

बैंगनी के पार तीखी मार है।
श्याम रंग तो दु:ख की भरमार है।।

नील वर्णी शान्ति की आभा अमर।
रंग पीला है उदासी की खबर।।

आसमानी वृहद अपनी गोद फैलाए खड़ा।।
हो सहिष्णु सर्वहारा भाईचारा ले बड़ा।।

रंग केशरिया उछाह उत्सर्ग है।
जिन्दगी अविराम बहते सर्ग है।।

इस धरा का रंग हरित पारिधान है।
त्याग, आर्जव, दम, शील महान है।।

रंग हर कोई नियति का मान है।
धर्म की सद् राह हो यह आन है।।

जिन्दगी इन सब रंगों की मेल है।
ईश का वरदान और नसीबा खेल है।।

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Thursday, 10 May 2018

मुक्तक

स्वयं के वास्ते एक पल कभी भी जी नही पाया ।
सरल पीता रहा हरदम गरल में पी नही पाया ।
निशानी वक्ष पर मेरे सदा देते रहे तुम सब
तुम्हारे घाव के उपहार को मै सह नही पाया ।

कभी होगी रजत सी चाँदनी नभ में
कभी होगी निविड़ तम से भरी रातें
मैं बन कर दीप अपनी रोशनी लेकर
खड़ा हूँ राह में तेरी सहूँगा सब तेरी बातें

रोशनी की बारात

आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
       
साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।।

कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।
       

जमीन आसमान


जानते हो?
बादल हजारों मील चल कर
जाते हैं परबत पर
अपने आप को उस पर गलाने को
खो देते हैं नाम भी अपना
सिर्फ इसलिए कि
पर्वत जल से भर जावे
पर अपनी गर्विता में पर्वत
बादलों के तप को
अक्सर बहा दिया करता है
स्वागतों में उस बिखरते नीर को
धन्य है वे जो बिछे हैं इस जमीं पर
पोखर, झील, और सरवर बन कर
देखता है जब कोई चढ़ कर शिखर पर
चींटियों से लग रहे थे सब जमीं के आदमी
एक खिलौना लग रही थी वह लिबर्टी
जेट में उड़ते हुए इक गुरूरे-सक्ष को
छू रही आकाश की सरहद पतंगे
भूल कर के तार को और सरजमीं को
कौन जाने बहक जाए हवा की नीयतें
तार टूटे फिर नसीबा उसका जमी है
पाँव की मिट्टी अभी उन कंधरो पर
शेष है जिन से चढ़े थे शूरमा सब

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