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Thursday, 10 May 2018

जमीन आसमान


जानते हो?
बादल हजारों मील चल कर
जाते हैं परबत पर
अपने आप को उस पर गलाने को
खो देते हैं नाम भी अपना
सिर्फ इसलिए कि
पर्वत जल से भर जावे
पर अपनी गर्विता में पर्वत
बादलों के तप को
अक्सर बहा दिया करता है
स्वागतों में उस बिखरते नीर को
धन्य है वे जो बिछे हैं इस जमीं पर
पोखर, झील, और सरवर बन कर
देखता है जब कोई चढ़ कर शिखर पर
चींटियों से लग रहे थे सब जमीं के आदमी
एक खिलौना लग रही थी वह लिबर्टी
जेट में उड़ते हुए इक गुरूरे-सक्ष को
छू रही आकाश की सरहद पतंगे
भूल कर के तार को और सरजमीं को
कौन जाने बहक जाए हवा की नीयतें
तार टूटे फिर नसीबा उसका जमी है
पाँव की मिट्टी अभी उन कंधरो पर
शेष है जिन से चढ़े थे शूरमा सब

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन