आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।।
कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।

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