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Monday, 15 July 2019

इश्क उग आया

वक्त की इस बड़ी इमारत में
दो पलों की दरार में
वह मधुर मुस्कान
अंकुरित हुए
पीपल के बीज की तरह
इश्क उग आया
नव कोंपलें सज गई
पौधा यह ...
...हमारा तुम्हारा

Saturday, 29 June 2019

मृदुहास


मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।

आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।

Tuesday, 18 June 2019

मैं वहाँ तुम यहाँ

"मैं वहाँ तुम यहाँ"

मैं ही उतरा था एक दिन!
जैसे परिंदा कोई
उतरता है तुम्हारे आंगन में
बहती थी जहाँ
शीतल मंद सुगन्धित समीरण

मैं ही तो था वह!
इक नन्हे बच्चे सा
अपनी खोई गिल्लियॉ लेने
आ गया हो ऐसे ही,
महके उस उपवन में
जैसे आ जाती है गोरैया
फरफराती उजालदानों पर

न दी दस्तक ही दरवाजे पर 
सरसराते पत्तों ने
पुकारा था तुम्हे नाम लेकर
देखता रहा वक्त रुक कर
तुम्हारी बाहों के झूले पर
हाँ, था वह मैं ही
सिरहाने थे रेशमी अहसास
उतर न पाए थे बोल 
चिपके रह गए हो जैसे
शहदीले अधरों में

लौट कहाँ पाया
पूरा मैं अब तक
छूट गया कुछ-कुछ मैं ही 
साथ चल रहे हो 
तब से अब तलक तुम भी

छूटे हम, पर छूटे कहाँ
फिर ख़ुद-ब-ख़ुद
एक-दूसरे को पाने को
क्योंकि, मैं हूँ वहाँ, तुम हो यहाँ
निरन्तर, अविरल, अविचल

Sunday, 2 June 2019

"वृक्षों के शव पर बैठे हैं"


वृक्षों के शव पर बैठे हो
प्रश्न तुम्हारे प्रश्न हुए हैं
क्यों तपती है धरती माता
क्यों आँगन अंगार हुए हैं।

शासन और प्रशासन दोनों
डंठल बो कर कागज भरते
जंगल के रखवाले खुद ही
जंगल खा कर मिट्टी करते।

इस पावस में मेघ न बरसे
आकर वापस लौट गए हैं
तपती धरा रही प्यासी ही
ताल तलैया रीत गए हैं।

हरियाली के पोस्टर होंगे
सपनों में जंगल देखोगे
लद गए दादी के वे किस्से
मंगल जिल्दों में देखोगे।

झरनों और प्रपातों के शव
उनकी बयाँ कहानी होगी
शेष रही चट्टानो को ही
व्यथा कथा सब गानी होगी।

पीपल वट ऑवल के तरु की
हम पूजा क्यों करते हैं
वृक्षों में देवत्व बसा है
ढोंग धतूरा क्यों धरते हैं।

मेढ़ों पर बूढ़े वृक्षों की
जड़ में मठ्ठा ही भरते हैं
पंछी आ कर चुग जाएँगे
फसल हमारी हम डरते हैं।

अब अभिशाप भुगतने होंगे
हमने कुदरत से खेला है
कृत्रिम खाद ठूँस दी इतनी
मिट्टी अब केवल ढेला है।

दूर नही दिन लिख लो यारों
प्लास्टिक के ताबूत बनेंगें
बिन लकड़ी के सारे शव ही
बिजली के शव-दाह दहेंगे।

रामनारायण सोनी

(02.06.2019)

Friday, 31 May 2019

गीत अधरों पर बुनो

आज कोकिल कोकिला संग स्वर मिलाती
साज संगत के कहीं रख सुनो तुम भी सुनो
आम्र कुञ्जों में सजा एकल मुखर रव ही
ओ रागिनी के सप्त स्वर गुनो तुम भी गुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

साँस साधे क्यों खड़े तुम पथिक पाथेय बन
मंजरी के, भ्रमर के संग नवगीत तुम बुनो
गुलमोहर की रक्तिमा भी लाजवन्ती लग रही
स्वर्ण चम्पा केतकी ओ! प्रीत के पाहुन चुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

रामनारायण सोनी

(३१*५*१९)

Wednesday, 29 May 2019

यह नदी अभिशप्त सी है

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
जान हो यह सुप्त सी है।

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

Thursday, 9 May 2019

मनुज की भूख


भैरवी के स्वर भयानक हो गये
बन्दिशों में बस बिखरता शोर है
उपवनों में है हलाहल घुल रहा
बस्तियाँ जलती लगा यह भोर है।

वासना के गुल्म में बहके कदम
कुन्दनों के बक्स में पत्थर मिले
बाँबियों में विषधरों के वंश हैं
सत्य के तन में घने विषदंश हैं

भट्टियों सी तप रही वसुधा मेरी
मनुज ही का यह भयानक ताप है
पी गया पानी सरों का सरित नद का
इस पवन की शुद्धता सूली चढ़ी है

शिखर की ऊँचाइयाँ गिरने लगी
आदमी की भूख कितनी बढ़ रही
उम्र की पूँजी उड़ी व्यापार बन
धन पिपासा रात दिन यूँ बढ़ रही

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