दो पलों की दरार में
वह मधुर मुस्कान
अंकुरित हुए
पीपल के बीज की तरह
इश्क उग आया
नव कोंपलें सज गई
...हमारा तुम्हारा
मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।
आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।
वृक्षों के शव पर बैठे हो
प्रश्न तुम्हारे प्रश्न हुए हैं
क्यों तपती है धरती माता
क्यों आँगन अंगार हुए हैं।
शासन और प्रशासन दोनों
डंठल बो कर कागज भरते
जंगल के रखवाले खुद ही
जंगल खा कर मिट्टी करते।
इस पावस में मेघ न बरसे
आकर वापस लौट गए हैं
तपती धरा रही प्यासी ही
ताल तलैया रीत गए हैं।
हरियाली के पोस्टर होंगे
सपनों में जंगल देखोगे
लद गए दादी के वे किस्से
मंगल जिल्दों में देखोगे।
झरनों और प्रपातों के शव
उनकी बयाँ कहानी होगी
शेष रही चट्टानो को ही
व्यथा कथा सब गानी होगी।
पीपल वट ऑवल के तरु की
हम पूजा क्यों करते हैं
वृक्षों में देवत्व बसा है
ढोंग धतूरा क्यों धरते हैं।
मेढ़ों पर बूढ़े वृक्षों की
जड़ में मठ्ठा ही भरते हैं
पंछी आ कर चुग जाएँगे
फसल हमारी हम डरते हैं।
अब अभिशाप भुगतने होंगे
हमने कुदरत से खेला है
कृत्रिम खाद ठूँस दी इतनी
मिट्टी अब केवल ढेला है।
दूर नही दिन लिख लो यारों
प्लास्टिक के ताबूत बनेंगें
बिन लकड़ी के सारे शव ही
बिजली के शव-दाह दहेंगे।
रामनारायण सोनी
(02.06.2019)
आज कोकिल कोकिला संग स्वर मिलाती
साज संगत के कहीं रख सुनो तुम भी सुनो
आम्र कुञ्जों में सजा एकल मुखर रव ही
ओ रागिनी के सप्त स्वर गुनो तुम भी गुनो।
गीत अधरों पर बुनो।।
साँस साधे क्यों खड़े तुम पथिक पाथेय बन
मंजरी के, भ्रमर के संग नवगीत तुम बुनो
गुलमोहर की रक्तिमा भी लाजवन्ती लग रही
स्वर्ण चम्पा केतकी ओ! प्रीत के पाहुन चुनो।
गीत अधरों पर बुनो।।
रामनारायण सोनी
(३१*५*१९)
यह नदी अभिशप्त सी है
जल नही बहता यहाँ
जान हो यह सुप्त सी है।
घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।
पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।
खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।
प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।
हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।
बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।
भैरवी के स्वर भयानक हो गये
बन्दिशों में बस बिखरता शोर है
उपवनों में है हलाहल घुल रहा
बस्तियाँ जलती लगा यह भोर है।
वासना के गुल्म में बहके कदम
कुन्दनों के बक्स में पत्थर मिले
बाँबियों में विषधरों के वंश हैं
सत्य के तन में घने विषदंश हैं
भट्टियों सी तप रही वसुधा मेरी
मनुज ही का यह भयानक ताप है
पी गया पानी सरों का सरित नद का
इस पवन की शुद्धता सूली चढ़ी है
शिखर की ऊँचाइयाँ गिरने लगी
आदमी की भूख कितनी बढ़ रही
उम्र की पूँजी उड़ी व्यापार बन
धन पिपासा रात दिन यूँ बढ़ रही