*

*
*

Wednesday, 13 November 2019

लौटा जीवन में फिर बसन्त

उठ खड़ा हुआ ले अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग्दिगन्त।
बीत गया दुःख का पतझड़
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य दृष्टि में धरा रहे।।

कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
इतिहासों के वे काले पन्ने
वे फिर फिर अब दोहराएँगे।।

कितनी उल्काएँ गिरती हो
भीषण झंझा की भर भेरी।
हो ऊर्जा जो भुजदण्डों में
किस्मत भी बनती है चेरी।।

सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।

मैं पीड़ा का गायक हूँ


दो पल को जागा फिर
बरसों तक सोया हूँ
आशा के पंखो पर
सपनों को ढोया हूँ

साँसों ने मोहलत दी
उतना भर जी पाया
कतरा भर पानी था
सागर में खो आया

आँसू का मोल यहाँ
बालू से सस्ता है
झूँठों की बस्ती में
साँच हुआ खस्ता है

फूलों की सेज सजी
नीचे बस शूल धरे
सूनी इस अमराई में
गिद्धों के शोर भरे

दोहरे इस चेहरे से
दर्पण भी हार गया
जीवन के उपवन को
पाला क्यूँ मार गया

सुर तो सब मीठे है
कँपते उन तारों के
पिटते हैं ढोल सभी
गीत सजे प्यारों के

जीवन की धारा संग
तिनके सा बहता हूँ
भीतर सौ ज्वाल लिये
बाहर से हँसता हूँ

Tuesday, 29 October 2019

इश्क तो बस इश्क है

जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?

इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?

हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है

इश्क तो इश्क ही बस है

मैं वही मिट्टी हूँ

मिट्टी ने सुगबुगाया
गली मैं, तपी मैं
पर जब बना कुछ
तो नाम मेरा बदल गया
मिट्टी से हो गई हूँ "दिया"

बाहर फिर एक तपन है
बाती में फिर एक अगन है
पर अब मुझसे एक उजास है
तिमिर से तुमूल की प्यास है

गुमसुम ये राहें रोशन हुई
दिशाएँ फैल गई सब ओर
तपन में ढूँढ लिया है
मैने चिर सुख
बाँटते रहने का सुख

मैं वही अमर मिट्टी हूँ
चाहे मैं, दिया हूँ तुम्हारे लिये
मैं फिर भी वही मिट्टी हूँ

रामनारायण सोनी
(२९.१०.१९)

Sunday, 27 October 2019

तमस दीप पर भारी है

है बौने दीप का साहस अँधेरी रात डरती है
भले हो कालिमा भारी अमावस भी सिहरती है।

अँधेरी आस्थाओं में भरम के तन्तु गलते हैं
प्रकट हो रोशनी के क्षण सभी दुःस्वप्न जलते हैं।

किरण का प्रस्फुटन ही विजय की नीव रखता है
तमस पर जीत की लिखी कहानी साथ रखता है

धरा की ओढ़नी में ये सितारे दीप के टाँके
सुहागन रात मस्ती में अहा! मधुकुञ्ज से झाँके

रंगोली मेरे आँगन की ये है प्रीत का परिमल
बताशे खील और धानी सजा इस साँझ का आँचल।

Tuesday, 10 September 2019

जीवंत जीवन

जो लहराते नहीं
  वे झंडे नहीं हैं
जो उगते नहीं
वे बीज नहीं है
जो पसीजे नहीं
  वे मानव नहीं है
जिनमें उमंग नहीं
  वे जीते नहीं है

लकीरों का अग्नि पथ

वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
घिसटते हुए साँप की
छूटी उन लकीरों जैसे

कभी चमकती है
लकीरें अग्नि पथ सी
कभी धुँधियाती है
बुझी यादों के धुऐं सी

लकीरें हाथों की
सिलवटें माथों की
गुजरते वक्त की
सियाही रातों की
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन