वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
घिसटते हुए साँप की
छूटी उन लकीरों जैसे
कभी चमकती है
लकीरें अग्नि पथ सी
कभी धुँधियाती है
बुझी यादों के धुऐं सी
लकीरें हाथों की
सिलवटें माथों की
गुजरते वक्त की
सियाही रातों की
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए

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