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Friday, 15 December 2017

डायरी

जीवन की डायरी के वे सफ़े
आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है

कलम वो भी थी
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ

यहाँ छन्द, बन्द,
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
चहक उठी तरुणाई है
रामनारायण सोनी

Thursday, 14 December 2017

सिद्ध मौन


मौन कितने मौन हो तुम
पर सजगता है तुम्हारी
शोर के भीषण प्रहर में
गहनता तुममें है भारी

मौन तो एक साधना है
यह ईश की आराधना है
साध्य का अनुसंधान है
और सिद्धि का सोपान है

स्वयं का जब द्वार खोले
व्यष्टि तब साकार होवे
शांति का वह महासागर
त्वरा मन की क्षीण होवे

मौन भारी शोर पर है
जब पलटता है स्वयं में
बाँसुरी सुनता मधुर यह
प्रलय के भी उस समय में
रामनारायण सोनी

Thursday, 7 December 2017

क्षणिका

कभी कभी प्रस्तर तोड़ कर 
पीड़ा प्रकट हो जाती है
रोकते तो वृणों का जन्म हो जाता
इसमें विकल एक आँच है
पर गहरी एक साँच है

Sunday, 3 December 2017

नई किताब हूँ

पुरानी सी जिल्द में मढ़ी  एक नई किताब हूँ मैं
उम्मीद के तारों भरे आसमाँ में  एक महताब हूँ मैं
दो कदम चल सकूँ संग संग हमकदम हो कर मैं
पोशीदा, शोख, सतरंगी ऐसा ही एक ख्वाब हूँ मैं ।।

फिर नई होगी सुबह

 फिर नई होगी सुबह

फिर नई होगी सुबह
फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे

शेष है बस दिवस तीन
फिर नई होगी सुबह
जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर

फिर नई होगी सुबह
माँ लिये आशीष के वर
अनवरत आधार बनती
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण बसती

फिर नई होगी सुबह
प्रार्थना के मूल में माँ
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है


जाग उठ हुँकार भर

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

ईश का आशीष है जब
अनवरत आधार बनता
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण चलता।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

प्रार्थना का मूल प्रभु की
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

Monday, 27 November 2017

शब्द - धरा


शब्द जो जिन्दगी भर
साथ चलते है, जीते हैं
हाँ,  वे कभी मरते नहीं हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो आसमान को
मुट्ठी मे भर लेते हैं

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो भावों का सागर
चुल्लू में समेट लेते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो मेरे भीतर से चल कर
तेरे भीतर जाते हैं

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो अन्धेरों को चीर कर
बुझे मन के दीप जला जाते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो यादों के अंबार में से
खुद को, तुमको ढूँढ लाते है

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो सूखे हृदय में से भी
करुणा, प्रेम, रस बहाते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
वे न कहीं जाते है न आते हैं
मुझी में घर बना लेते हैं

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जब जब गिरता हूँ तो
प्यार से उठाते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो हौले से आते हैं
डूबते दिल को थपकी दे जाते है

जैसे मैं, तू, तुम, हम, अपन
प्यार, करुणा, दुलार,
ये ऐसे ही कुछ शब्द होते हैं

और...
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो जिन्दगी में तो रहते ही हैं
जिन्दगी के बाद भी रह जाते हैं

शब्द सिर्फ अक्षरों का मेल नहीं
भावों की रेल है
शब्द सिर्फ घावों की पीड़ा ही नहीं
मरहम की जेल है
शब्द सिर्फ ज्ञान का आधार नही
जीवन का खेल है
शब्द सिर्फ द्वन्द्व ही नहीं
सुकून का मेल है

अर्थों के, भावों के
इस पार, उस पार
जतन से कहीं धर लें
समय के पंछी के
चुगने से पहले

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन