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Monday, 23 March 2020
न मैं रहूँ न मेरा कुछ
Friday, 14 February 2020
छत पर जाता नहीं हूँ
Friday, 7 February 2020
छत पर जाता नहीं हूँ
Monday, 3 February 2020
गीत बसन्ती
Wednesday, 29 January 2020
स्वप्न सारे ढह गए
अस्तबल में हिनाहिनाहट, थी गिन्नियों की खनखनाहट।
देखते ही देखते सब बिक गए, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।
सब वचन तख्तियाँ टूटी पड़ी है, बस छलावों का ही कद ऊँचा हुआ।
उन मतों की मौत का मातम लिये, हम घुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।
वक्त ने भी बीत कर हमको छला, पाँच वर्षों बाद लौटेगा कभी।
ले मुकद्दर की लकीरें हाथ में, हम मिटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।
फिर दुःशासन के कुशासन में फँसी, लोकतंत्री द्रौपदी की लाज है।
उँगलियों में ले सुदर्शन आज इन, हम जुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।
उँगलियों की स्याही भी सूखी नही, पालियों की वे लकीरें मिट गई।
खेल हैं या हैं तमाशे ये सभी, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।
अब हमें कानून ऐसा चाहियेगा, गर बदलते बीच में तुम पन्थ अपना।
मान्यता ही खीच लें वापस तेरी, हम तुम्हे इतना भी क्यों सहते गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।
रामनारायण सोनी
२९।०१।२०२०
काले उजाले
डरा हुआ
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन