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Saturday, 28 November 2020

करता तो तू है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

रामनारायण सोनी
३०.११.२०२०

Monday, 23 March 2020

न मैं रहूँ न मेरा कुछ

तू पानी है 
हल्दी हूँ मैं
घुल कर तुझमें 
खो कर खुद ही
बस रंग छोड़ जाऊँगी

तू हथेली है
हिना हूँ मैं
रच कर तुझमें
लकीरों की छाँह में
बस छुप कर रह जाऊँगी

करुणा सागर तू
नन्ही इक बूँद मैं
डूब कर सागर में
न मैं रहूँ न मेरा कुछ 
बस पानी रह जाऊँगी

रामनारायण सोनी



Friday, 14 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Friday, 7 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Monday, 3 February 2020

गीत बसन्ती

गीत बसन्ती 

आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

चम्पा चमेली ने है माँडी रंगोली, 
अँबुवे की डाली पे कोयल बोली,
पपिहे ने कानों में मिसरी है घोली,
टेसू-जुही मिल के करत ठिठोली,
महुए पे छाया खुमार, समीरन चंवर डुले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रागों ने छन्दों से रास रचाया,
फागों ने खुशबू का कीच मचाया,
शब्दों ने भावों का उबटन लगाया,
साजों-सुरों ने है अलख जगाया,
गीतों ने ओढ़ा सिंगार, रसिया आन मिले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रामनारायण सोनी
०४/०१/२०२०

Wednesday, 29 January 2020

स्वप्न सारे ढह गए


अस्तबल में हिनाहिनाहट, थी गिन्नियों की खनखनाहट।
देखते ही देखते सब बिक गए, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

सब वचन तख्तियाँ टूटी पड़ी है, बस छलावों का ही कद ऊँचा हुआ।
उन मतों की मौत का मातम लिये, हम घुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

वक्त ने भी बीत कर हमको छला, पाँच वर्षों बाद लौटेगा कभी।
ले मुकद्दर की लकीरें हाथ में, हम मिटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

फिर दुःशासन के कुशासन में फँसी, लोकतंत्री द्रौपदी की लाज है।
उँगलियों में ले सुदर्शन आज इन, हम जुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।

उँगलियों की स्याही भी सूखी नही, पालियों की वे लकीरें मिट गई।
खेल हैं या हैं तमाशे ये सभी, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

अब हमें कानून ऐसा चाहियेगा, गर बदलते बीच में तुम पन्थ अपना।
मान्यता ही खीच लें वापस तेरी, हम तुम्हे इतना भी क्यों सहते गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

रामनारायण सोनी
२९।०१।२०२०

काले उजाले

क्या तुम्हारी
मेरी, 
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन