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Wednesday, 28 April 2021

कर्ज मिट्टी का

कर्ज मिट्टी का

मैं गुनाहों के तले अपने दबा ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
पेट मेरा उम्र भर से तू सदा भरती रही
भूख मेरी प्यास मेरी क्यूँ अधूरी ही रही
तू जली है, तू गली है पालने संसार ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

फेंक बीजों को तुझी में सो गया घर में
तू लगी थी रात दिन ही प्यार भर उर में
एक दिन फसलें पकी मैं काट लाया हूँ
गंदगी अपनी वहीं  मैं छोड़ आया हूँ
ग्लानि से अपनी ही मैं तो भर गया ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

तू धरित्री, पालियित्री इस भुवन को धर रही
इस समूची सृष्टि में ही नित नदी ये बह रही
पादपों के और तृणों के रोम तन में धारती
गर्भ में ज्वालामुखी पर उफ नही उच्चारती
जान कर भी मैं सभी यह हो रहा हूँ मूढ़ ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

इन रगों में रक्त जो दिन रात बहता है
मेरे इस तन में तेरा ही वास रहता है
मुझ से पहले, बाद में भी तू रहेगी माँ
नस्ल मेरी, पुश्त मेरी फिर कहेगी माँ
भूल पाऊँगा कहाँ एहसान सब कैसे?
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

रामनारायण सोनी
२५-०४-२१

Friday, 26 March 2021

खपरैली बस्ती में

खपरैली बस्ती में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में

भींच लिये ओंठ और भींची जब आँख मेरी
मन ही मन लगता है अंबर ने पाँख धरी
भैंसों की पीठों पर फिर चढ़ बैठें मस्ती में
पोखर के छिछले से पानी की छप छप में
कनुवे की किलकारी गूँज रही ढप ढप में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में।
                           खपरैली बस्ती में।।
तन मन सब भींग गया यादों के झुरमुट में
चूजों संग दौड़ रहा मन घूरे पर सरपट में
बोल रही शीशी में पनचक्की पुक पुक कर 
कोयल जहँ कूक रही आमों के उपवन में
भर ले पोटाश जरा लोहे की गजगुण्डी में
लहसुनिया फोड़ें भित्ती पर चल मण्डी में
                           खपरैली बस्ती में।।
चाचा के चौंतर पर खेलें चंग पौ और चौपड़
तारा और मुन्नी की सुन पाँचों की खड़ खड़ 
मस्तानी टुल्लर जो खेल रही है लंगड़ी भी
खेलें ढप्पी और पव्वा नीम तले दुकड़ी भी
अन्नी-चन्नी की धूम मची चन्दन के औसारे
कपड़े की गेंद बना गधामार टप्पे भर मारे
                           खपरैली बस्ती में।।

रामनारायण सोनी
२६.०३.२०२१

Saturday, 20 March 2021

गाओ! गीत कोई ऐसा

तुमने मेरी पुकार को 
शब्द भर समझा
यार मेरे !
वे मेरे हृदय के स्पन्दन हैं
और,
मेरे संयम की परिधियाँ
मेरी अपनी ही निर्मिति हैं
सागर के साहिल की तरह
मेरा यह प्रेम सागर
किनारों पर लगा होगा छिछला
पर जरा भीतर आओ तो!
डूब कर देखो संग - संग!!

यही जिंदगी है क्या ?
कि रो कर आये
और
रुला कर चल दिये
मुश्किल से मिले इस अधबीच को 
थोथी उम्र से नहीं....
उपलब्धियों, मीठे रिश्तों से नापो, 
फिर..उल्लास से भर लो..

कान, आँख, नाक
यहाँ तक कि स्पर्श को
बाहर रख कर भीतर चलो
तुम्हारा सहोदर 'आनन्द'
प्रतीक्षा में बैठा है।

तुमने इस घने अँधेरे को 
अमावस समझ लिया 
ऐसा बिल्कुल नहीं है, 
तुम्हारे सुन्दर पावन कक्ष के
सभी द्वार और खिड़कियाँ बन्द पड़ी हैं
खुशबू लेकर आई 
मलियानिल दस्तक देकर
लौट - लौट गई।
प्रकाश और ताजगी
द्वार पर खड़ी हैं

वक्त की दीवार पर टँगी
घड़ी की सुइयाँ
अपने पद-चिन्ह नहीं छोड़ती हैं।
ताले नहीं होते हैं
इन मिट्टी की गुल्लकों में
टूट कर बिखरती है
और अपना सब बिखेर भी देती हैं

बो कर देखो
मुस्कुराहटों के बीज
खेत अपना हो या पराया,
संगीत वीणा के तारों में नहीं
उसके स्पन्दन में है।
बैठा नही रह जावे
गीत कोई कण्ठ के उस पार
गुनगुनाओ उसे, क्योंकि
जरूरत है तुम्हें, मुझे और सब को यही

रामनारायण सोनी
२१।०३। २१

आकाश में घर नहीं बनते

डर लगता है मुझे बहुत

उन ऊँचाइयों पर खड़े होने से
झाकने से झाँई आती है जहाँ से
सोचता हूँ मैं अकसर कि..
तुम कितने ऊँचे हो गये हो
दृष्टि विहंगम तुम्हारी देख ही लेगी
मुझे ज़मीन पर कहीं न कहीं
लगता है अब तो..
जैसे बीहड़ में आ गया हूँ
पर तुम्हारे पंख बड़े हो गये हैं
नजरें भी बादलों को भेद कर
नीहारिकाओं में उलझ गई तुम्हारी
स्मृतियाँ भी फेंक दी है कहीं तुमने!
लौट भी आओ इस बिखरते नीड़ में
अपनी धरती, अपनी शाख पर
शाम होने से पहले!
सुन सको तो सुनो!!
आकाश में घर नहीं बनते!

रामनारायण सोनी
१९.०३.२१

Tuesday, 16 March 2021

कहाँ गए हो!

मैंने बादल की ओर देखा
शायद बरसात हो जाए,
फूल को छुआ कि मुझे
शायद तुम्हारी छुअन का
कोमल अहसास हो जाए

कलम उठाई कि तुम्हें लिख डालूँ
पर तुम शब्द तो हो नहीं हो
जुबां भी जिसे न बोल पाए
कि कहीं काँपते अधरों पर ठहरी
नयनों की खारी बूँद न ढुल जाए

मैंने हवाओं की खुशामदें की
कि वे शायद कोई खबर लाए
पर वे लौट गईं उल्टे पाँव ही४ पैरों के वे निशान भी
रास्तों पर से नोच गया है कोई

रामनारायण सोनी

रूही हो तुम!


हाँ तुम!
तुम कौन हो?
क्या तुम वही हो?
नहीं जो लोग देख रहे हैं..
वह तुम नहीं हो..
सुचिते!
मेरे लिये तुम!
"तन्वी नहीं, रूही हो"
मैंने घटती बढ़ती
तुम्हारी देह के पार...
तुम्हारे अन्तर का सौंदर्य
मर्म की सुकोमलता
और मेरी होने का
अहसास देखा है
सिर्फ वही हो
मेरी, तुम!

रामनारायण सोनी

तुम्हारा ही शब्दकोष



मैने कह दी है
अपनी सारी बातें
उस भाषा में ही
सुन और समझ भी रहे हो तुम
अच्छी तरह से
इसीलिये तो...
मैं भाग्यशाली हूँ
मेरी यह भाषा मौन है
जिसका पूरा शब्दकोष
तुमने ही तो लिखा है।

रामनारायण सोनी

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