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Tuesday, 16 March 2021

रूही हो तुम!


हाँ तुम!
तुम कौन हो?
क्या तुम वही हो?
नहीं जो लोग देख रहे हैं..
वह तुम नहीं हो..
सुचिते!
मेरे लिये तुम!
"तन्वी नहीं, रूही हो"
मैंने घटती बढ़ती
तुम्हारी देह के पार...
तुम्हारे अन्तर का सौंदर्य
मर्म की सुकोमलता
और मेरी होने का
अहसास देखा है
सिर्फ वही हो
मेरी, तुम!

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन