तुमने मेरी पुकार को
शब्द भर समझा
यार मेरे !
वे मेरे हृदय के स्पन्दन हैं
और,
मेरे संयम की परिधियाँ
मेरी अपनी ही निर्मिति हैं
सागर के साहिल की तरह
मेरा यह प्रेम सागर
किनारों पर लगा होगा छिछला
पर जरा भीतर आओ तो!
डूब कर देखो संग - संग!!
यही जिंदगी है क्या ?
कि रो कर आये
और
रुला कर चल दिये
मुश्किल से मिले इस अधबीच को
थोथी उम्र से नहीं....
उपलब्धियों, मीठे रिश्तों से नापो,
फिर..उल्लास से भर लो..
कान, आँख, नाक
यहाँ तक कि स्पर्श को
बाहर रख कर भीतर चलो
तुम्हारा सहोदर 'आनन्द'
प्रतीक्षा में बैठा है।
तुमने इस घने अँधेरे को
अमावस समझ लिया
ऐसा बिल्कुल नहीं है,
तुम्हारे सुन्दर पावन कक्ष के
सभी द्वार और खिड़कियाँ बन्द पड़ी हैं
खुशबू लेकर आई
मलियानिल दस्तक देकर
लौट - लौट गई।
प्रकाश और ताजगी
द्वार पर खड़ी हैं
वक्त की दीवार पर टँगी
घड़ी की सुइयाँ
अपने पद-चिन्ह नहीं छोड़ती हैं।
ताले नहीं होते हैं
इन मिट्टी की गुल्लकों में
टूट कर बिखरती है
और अपना सब बिखेर भी देती हैं
बो कर देखो
मुस्कुराहटों के बीज
खेत अपना हो या पराया,
संगीत वीणा के तारों में नहीं
उसके स्पन्दन में है।
बैठा नही रह जावे
गीत कोई कण्ठ के उस पार
गुनगुनाओ उसे, क्योंकि
जरूरत है तुम्हें, मुझे और सब को यही
रामनारायण सोनी
२१।०३। २१

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