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Saturday, 20 March 2021

आकाश में घर नहीं बनते

डर लगता है मुझे बहुत

उन ऊँचाइयों पर खड़े होने से
झाकने से झाँई आती है जहाँ से
सोचता हूँ मैं अकसर कि..
तुम कितने ऊँचे हो गये हो
दृष्टि विहंगम तुम्हारी देख ही लेगी
मुझे ज़मीन पर कहीं न कहीं
लगता है अब तो..
जैसे बीहड़ में आ गया हूँ
पर तुम्हारे पंख बड़े हो गये हैं
नजरें भी बादलों को भेद कर
नीहारिकाओं में उलझ गई तुम्हारी
स्मृतियाँ भी फेंक दी है कहीं तुमने!
लौट भी आओ इस बिखरते नीड़ में
अपनी धरती, अपनी शाख पर
शाम होने से पहले!
सुन सको तो सुनो!!
आकाश में घर नहीं बनते!

रामनारायण सोनी
१९.०३.२१

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन