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Sunday, 22 July 2018

तुम मेरे और मैं तुम्हारा

मैं चलता हूँ
दिग् दिगन्त में
महज चलने के लिए
चाहे तुम मिलो न मिलो
पर कहीं न कहीं हो तुम
जरूर यहीँ कहीं हो तुम
सर्वत्र ही पाता हूँ स्पन्दन तुम्हारा
महसूस करता हूं दिन-रात तुम्हें
इसलिए
मैं तुम्हारे पास होऊं या नही
तुम मेरे पास हो सदा ही
शायद तुम्हें पता ही नहीं
या शायद पता हो भी
पर तुम मेरे हो
और मैं तुम्हारा
सदा सदा 

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन