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Wednesday, 18 July 2018

मुक्तक

कलम झूम कर जब रवानी लिखेगी
रगों में मचलती जवानी लिखेगी
सुरों में सजी रागनी भी प्रणय की
निशा चाँदनी की सुहानी लिखेगी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन