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Friday, 13 July 2018

एकत्व का महोत्सव

बिन छुए ही जब
आत्मा आत्मा को गले मिल गयी
"मैं" का "तुम" में और 
तुम्हारी मैं का "मुझ" में 
एकत्व महोत्सव है आज

बहुरंगी इन्द्रधनुष घुल गया 
आत्मा के धवल उजास में
मत करो प्रयास 
पानी पर लकीर खींचने का
अब एक अन्दर से दूसरे अन्दर का
कौन करे फर्क

बिन छुए ही जब
आत्मा आत्मा को गले लग गयी
फिर तन छूने से कैसा प्रयोजन? 
हम हैं पावन, निर्लिप्त, विशुद्ध
शुचि हो तुम, शुचि ही रहोगे
शुचि ही रहेंगे हम।



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यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।गीता13/32।।
जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता। उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।गीता2/30।।
हे भारत यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।गीता13/31।।
कौन्तेय अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी वस्तुत वह न करता है और न लिप्त होता है।।

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