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Wednesday, 16 June 2021

प्रकृति का वाद्यवृन्द


आओ!
देखो जरा
केसे धरती और अम्बर
खिल उठे हैं
हवाएँ गुनगुना रही हैं
सागर की ये कैसी अठखेलियाँ
कलियाँ घूँघट खोले खड़ी हैं
तारों ने बाँध लिये हैं
पावों में घुंघरू
पछिपी बाँसुरी
बज उठी नन्दन वन में
देखो! सुनो!! थिरक लो!!!
सृष्टि और समष्टि
का मदिर-मदिर
बज रहा रसाल
प्रकृति का...
मधुरिम वाद्यवृन्द
डूब जाओ इसमें
अभी, हाँ अभी के अभी!!

रामनारायण सोनी
10.10.20

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन