कैसी चुभन है ये
कुछ काँटे
होते हैं बस झूठ मूठ के
पर सच्ची क्यों होती हैं
चुभन उनकी
और दर्द उनके,
वे कुछेक खास कहानियाँ
बस भावों, शब्दो, अर्थों के साथ
जीने लगती है मुझ में पूरी की पूरी
भुला देती हैं अकसर
कि "मैं कौन हूँ"
लगता है 'मैं' मैं नहीं, वो हूँ
उन नकली सकली सहपात्रों के संग
क्यों चल पड़ता हूँ मैं हमेशा
भँवर में घिरी नाव की तरह
हँस नहीं पाया भले ही,
तुम्हारी हँसी के साथ
पर तुम्हारा दर्द
क्यों सालता है मुझे फाँस की तरह
फिर भी, बार बार
वे काँटे, वह फाँस, वे दर्द
लगते है कितने सगे हैं ये मेरे अपने
रामनारायण सोनी
१६.०६.२१

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