गीले अहसास
पानी पर बनी परछाई
सह नही सकती
हवा का एक हलका सा झोंका भी
बादल में बने
उभरे छिछले नक्श
बिखर जाते हैं आकाश में
पीछे छूटता नहीं कुछ भी
छूट जाते हैं वहाँ टूटे बिखरे पल।
किसने छुआ है
इन अहसासों को
जो अभी तक गीले ही हैं!
तिनकों सी टाँगों वाली और
पीली चोंच वाली यह टिटहरी
आधी रात में भी
यादों की तरह टिटियाती है
और फिर भोर के वे सितारे!!
नजरें जिन पर ठहरी पड़ी थी...
आस की, विश्वास की..
कुछ रोशनियाँ दरोगे की तरह आई
और उठा ले गई उन्हें भी!
टूटी दीवार की अधठुँकी खूँटियों पर
निखालिस टँगा रह गया क्यों
मेरा यह बेचारा मन,
मेले की भीड़ में गुम हुए बच्चे सा..
हाँ यह मन!!
सुन तो ए मेरे मन!
पीछे मुड़, भीतर चल
रामनारायण सोनी
१५.०६.२१

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