आओ तुम्हें मैं हँसना सिखाऊँ
जीवन का वह छोर दिखाऊँ
बैठे हम में सहज सलोने
ईश्वर का दर्शन करवाऊँ।।
तुम भी तो मुझ जैसे ही थे
चंचल चपल हठीले नटखट
हाथ थाम कर आओ संग संग
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
जाने कौन गली में खोये
गुपचुप क्यों रोया करते हो
जीवन की भारी गठरी को
बेमन से ढोया करते हो ।
कूद पड़ो तुम उस अतीत में
जिसमे मस्ती यूँ झरती थी
किलकारी भरती सखियों की
वो टाँगा टोली तुम्हें दिखाऊँ।।
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
कैंची से सीखी थी सायकल
कीचड़ में गेड़ी चलती थी
बीले की खाली खोलों की
कोयल रस्सी से बजती थी।।
लकड़ी के घोड़े पर बैठे
कैसे तुम दौड़े फिरते थे
उस कुलाम डाले की डाली
पर फिर तुमको लटकाऊँ।।
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
ढूँढो फिर से उन यारों को
फिर से बचपन खड़ा हो सके
जिनको देख तुम्हारी आँखे
नेह नीर से सजल हो सके
उन भूले बिसरे रिश्तों की
स्वर्णिम सी उन शाम सुबह की
मद मस्ती की उस बस्ती की
मस्त गली में तुम्हे घुमाऊँ।।
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
टिम टिम कर जलते दीये की
मद्धिम मद्धिम छनी रोशनी
जमी काजली आले की से
चलो डिठौना तुम्हें लगाऊँ।।
ताल तलैया नदी छापरी
याद तुम्हें भी आती होगी
चुरा लिया करते थे अमिया
उस बगिया को तुम्हें दिखाऊँ।।
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
रामनारायण सोनी
१७.०८.२१

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