कौन हो तुम?
कौन हूँ मैं?
शायद "मैं" और "तुम"
"हम" ही हैं
यह विलय कैवल्य है
यह विलयन प्रेम है
यह प्रेम तब अलौकिक है
यह रसायन अद्भुत है
*"रसो वै सः"*
यह देहात्म भाव शून्यता
हमारे प्रेम का परिमार्जन है
प्रेम दीवानगी है वह
जो पैरों में फुँघरू बाँध देता है
प्रेम धारा है वह
जो हृदय के गर्भ से बहना शुरू करती है।
प्रेम वह आह्लाद है
जो मरुमय जीवन में आनन्द भर देता है
बाहें जहाँ करुणा से फैल जाती हैं
प्रेम में प्रधान तू है और अन्तिम भी तू है
तो फिर "मैं" हूँ ही कहाँ।
बस तू ही तू है।
रामनारायण सोनी
शब्दों के उस पार
भावों के सागर में
बस संधिकाल वही है
मैं और तुम...

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