सुनो सुनयने!
ये रात और दिन!
रात, जो नींद कम
जाग अधिक ले कर आती है
दिन, जो थकन
और पेशानियों पर
पसीने छोड़ जाता है
लेकिन बीच में!
इसी बीच में थोड़े पलों के लिये
संध्या गौओं की
पावन धूलियाँ ले कर आती है!
मल जाती है गुलाल
तुम्हारे रक्तिम कपोलों पर
निम्बोलियों की कड़वी मीठी
महमहाती गन्ध के बीच
हरियाई डाल पर रक्त कण्ठी सुग्गे
चिटिर-पिटिर करते चिंचियाते हैं
तुम्हारी ही तरह
चुलबुले चंचरीक की गुन-गुन सुर
कानों में मथु घोल जाते हैं
अचानक मेरे स्वप्न पाँखी
प्रीति के गहन आकाश में
डैने फैलाये तुम्हारे
अलकों पर उतर आते है
कुछ भार सा महसूस करता हूँ
अपने काँधे पर
कि तुम हो कर जैसे त्रिभंगी
अपना शीश टिकाए हो
मधुभार से
रामनारायण सोनी
४.७.२१

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